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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्ततो यन्ता कच्चित्क्षेमं नु पार्षत |  ५२   क
ईदृशं व्यसनं युद्धे न ते दृष्टं कदाचन ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति