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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
दैवय़ोगात्तु ते वाणा नातरन्मर्मभेदिनः |  ५३   क
प्रेषिता द्विजमुख्येन मर्माण्युद्दिश्य सर्वशः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति