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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
वेपथुं च शरीरे मे रोमहर्षं च पश्य वै |  ५६   क
वर्जय़न्व्राह्मणं युद्धे शनैर्याहि यतोऽच्युतः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति