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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं भीमसेनं वा समरे प्राप्य सारथे |  ५७   क
क्षेममद्य भवेद्यन्तरिति मे नैष्ठिकी मतिः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति