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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
प्रद्रुतं तु रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य मारिष |  ५९   क
किरञ्शरशतान्येव गौतमोऽनुय़यौ तदा ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति