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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
शिखण्डी च समासाद्य हृदिकानां महारथम् |  ६२   क
पञ्चभिर्निशितैर्भल्लैर्जत्रुदेशे समार्दय़त् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति