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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
कृतवर्मा तु सङ्क्रुद्धो मार्गणैः कृतविक्षतः |  ६८   क
धनुरन्यत्समादाय़ समार्गणगणं प्रभो |  ६८   ख
शिखण्डिनं वाणवरैः स्कन्धदेशेऽभ्यताडय़त् ||  ६८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति