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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य समरे वाणं भोजः प्रहरतां वरः |  ७३   क
जीवितान्तकरं घोरं व्यसृजत्त्वरय़ान्वितः ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति