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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
स तेनाभिहतो राजन्मूर्छामाशु समाविशत् |  ७४   क
ध्वजय़ष्टिं च सहसा शिश्रिय़े कश्मलावृतः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति