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कर्ण पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अपोवाह रणात्तं तु सारथी रथिनां वरम् |  ७५   क
हार्दिक्यशरसन्तप्तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति