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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णः कुरुभिः पूज्यमानो; यथा शक्रो वृत्रवधे मरुद्भिः |  ६३   क
अन्वारूढस्तव पुत्रं रथस्थं; हृष्टश्चापि प्राविशत्स्वं स सैन्यम् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति