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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
तान्प्रभग्नान्द्रुतान्दृष्ट्वा हतोत्साहान्पराजितान् |  ११   क
अभ्यद्रवन्त पाञ्चालाः पाण्डवाश्च जय़ैषिणः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति