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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा तु कौरवं सैन्यं भय़त्रस्तं प्रविद्रुतम् |  १३   क
अन्योन्यं समभाषन्त पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति