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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
विदितं भवतामेतद्यथा वृत्तः कुरुक्षय़ः |  १   क
ममापराधात्तत्सर्वमिति ज्ञेय़ं तु कौरवाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति