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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अद्य कृष्णस्य माहात्म्यं जानातु स महीपतिः |  १८   क
अद्यार्जुनधनुर्घोषं घोरं जानातु संय़ुगे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति