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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
वणिजो नावि भिन्नाय़ां यथागाधेऽप्लवेऽर्णवे |  २   क
अपारे पारमिच्छन्तो हते शूरे महात्मनि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति