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वन पर्व
अध्याय २५२
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जय़द्रथ उवाच
वय़ं पुनः सप्तदशेषु कृष्णे; कुलेषु सर्वेऽनवमेषु जाताः |  ११   क
षड्भ्यो गुणेभ्योऽभ्यधिका विहीना; न्मन्यामहे द्रौपदि पाण्डुपुत्रान् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति