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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
सिंहनादांश्च वहुशः शृणु घोरान्भय़ानकान् |  ३४   क
तस्माद्याहि शनैः सूत जघनं परिपालय़ ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति