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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
तेषामापततां तत्र संहृष्टानां परस्परम् |  ३९   क
संमर्दः सुमहाञ्जज्ञे घोररूपो भय़ानकः ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति