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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
वृषा यथा भग्नशृङ्गाः शीर्णदन्ता गजा इव |  ४   क
मध्याह्ने प्रत्यपाय़ाम निर्जिता धर्मसूनुना ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति