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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
स वध्यमानः समरे पदातिगणसंवृतः |  ४३   क
न चचाल रथोपस्थे मैनाक इव पर्वतः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति