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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
ते तु क्रुद्धा महाराज पाण्डवस्य महारथम् |  ४४   क
निग्रहीतुं प्रचक्रुर्हि योधांश्चान्यानवारय़न् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति