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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
अक्रुध्यत रणे भीमस्तैस्तदा पर्यवस्थितैः |  ४५   क
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं पदातिः समवस्थितः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति