अनुशासन पर्व  अध्याय २८

भीष्म उवाच

वह्वीस्तु संसरन्योनीर्जाय़मानः पुनः पुनः |  ५   क
पर्याय़े तात कस्मिंश्चिद्व्राह्मणो नाम जाय़ते ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति