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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
असकृत्त्वं मय़ा मूढ निर्जितो जीवितप्रिय़ः |  २७   क
मुक्तो ज्ञातिरिति ज्ञात्वा का त्वरा मरणे पुनः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति