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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
पादाता निहता भूमौ शिश्यिरे रुधिरोक्षिताः |  ४९   क
सम्भग्ना इव वातेन कर्णिकाराः सुपुष्पिताः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति