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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
पताकाध्वजसञ्छन्नं पदातीनां महद्वलम् |  ५१   क
निकृत्तं विवभौ तत्र घोररूपं भय़ानकम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति