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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
विप्रय़ातांस्तु वो भिन्नान्पाण्डवाः कृतकिल्विषान् |  ५८   क
अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेय़ो नः समरे स्थितम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति