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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मे द्रोणे च निहते सूतपुत्रे च भारत |  ६   क
यद्दुःखं तव योधानां भय़ं चासीद्विशां पते |  ६   ख
तद्भय़ं स च नः शोको भूय़ एवाभ्यवर्तत ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति