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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
न युद्धधर्माच्छ्रेय़ान्वै पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः |  ६१   क
अचिरेण जिताँल्लोकान्हतो युद्धे समश्नुते ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति