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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ो रथेनाजावभ्यवर्तत वीर्यवान् |  ६४   क
विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति