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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
द्विसाहस्राश्च मातङ्गा गिरिरूपाः प्रहारिणः |  ९   क
सम्प्राद्रवन्हते शल्ये अङ्कुशाङ्गुष्ठचोदिताः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति