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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तं वृक्षमादाय़ रिपुप्रमाथी; दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् |  १६   क
तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य; पार्थस्य पार्थः पृथुदीर्घवाहुः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति