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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ पुरस्तात्कमलाय़ताक्ष; स्तनुर्महासिंहगतिर्विनीतः |  २०   क
गौरः प्रलम्वोज्ज्वलचारुघोणो; विनिःसृतः सोऽच्युत धर्मराजः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति