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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
यौ तौ कुमाराविव कार्त्तिकेय़ौ; द्वावश्विनेय़ाविति मे प्रतर्कः |  २१   क
मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा; न्मय़ा श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति