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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्मिन्राजसमावाय़े देवानामिव संनय़े |  ५   क
किमय़ं सदृशं कञ्चिन्नृपतिं नैव दृष्टवान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति