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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
प्रणिपातेन दानेन वाचा मधुरय़ा व्रुवन् |  २९   क
अमित्रमुपसेवेत न तु जातु विशङ्कय़ेत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति