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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भरद्वाज उवाच
यद्यजीवं शरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् |  १४   क
शारीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदय़ते रुजम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति