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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भरद्वाज उवाच
शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् |  १५   क
महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति