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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भरद्वाज उवाच
न पश्यति न च व्रूते न शृणोति न जिघ्रति |  १७   क
न च स्पर्शरसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति