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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
एवं सुखसमाय़ुक्तो रमते विगतज्वरः |  २७   क
रूपवान्कीर्तिमांश्चैव धनवांश्चोपपद्यते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति