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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
पञ्चात्मके पञ्चगुणप्रदर्शी; स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा |  २०   क
स वेत्ति दुःखानि सुखानि चात्र; तद्विप्रय़ोगात्तु न वेत्ति देहः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति