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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् |  २४   क
तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति