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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् |  २९   क
प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमक्षय़मश्नुते ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति