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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भरद्वाज उवाच
नश्यतीत्येव जानामि शान्तमग्निमनिन्धनम् |  ४   क
गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न दृश्यते ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति