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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
समिधामुपय़ोगान्ते सन्नेवाग्निर्न दृश्यते |  ५   क
आकाशानुगतत्वाद्धि दुर्ग्रहः स निराश्रय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति