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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ शरीरं तदचेतनम् |  ८   क
पतितं याति भूमित्वमय़नं तस्य हि क्षितिः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति