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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा फल्गुनं वीरं चिरस्य प्रिय़मागतम् |  १०   क
पर्यष्वजत दाशार्हः पुनः पुनररिन्दमम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति