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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सभार्याः सपुरोहिताः |  १२   क
आनर्चुः पुण्डरीकाक्षं परिवव्रुश्च सर्वशः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति