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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मः परः पाण्डव राज्यलाभा; त्तस्यार्थमाहुस्तप एव राजन् |  १६   क
सत्यार्जवाभ्यां चरता स्वधर्मं; जितस्तवाय़ं च परश्च लोकः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति